August 12, 2019

जियो फाइबर: क्या है ये चीज़, जिससे आपका इंटरनेट चीते की रफ़्तार से दौड़ेगा?

इंटरनेट. तेज़ न हो, तो किसी काम का नहीं. लेकिन भारत में इंटरनेट तेज़ के अलावा सब कुछ है. दिसंबर 2018 में छपी बिज़नेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत मोबाइल इंटरनेट के मामले में दुनिया में 111 वें स्थान पर है. मोबाइल इंटरनेट से तंग आकर लोग घर पर तार वाला इंटरनेट माने फिक्स्ड ब्रॉडबैंड लगाते हैं. लेकिन भारत की किस्मत वहां भी अच्छी नहीं है. क्योंकि इसी रिपोर्ट के मुताबिक भारत फिक्स्ड ब्रॉडबैंड इंटरनेट स्पीड के मामले में 65वें नंबर पर आता है. मोबाइल इंटरनेट तो आज भी भगवान भरोसे है. लेकिन हो सकता है कि आने वाले दिनों में फिक्स्ड ब्रॉडबैंड के दिन फिरें, वो तेज़, बहुतै तेज़ हो जाए. ये उज्जवल संभावना पैदा हुई है ‘जियो गीगा-फाइबर’ के आने से.

12 अगस्त, 2019 को हुई रिलायंस इंडस्ट्रीज़ की एनुअल जनरल मीटिंग. इसमें मुकेश अंबानी ने ऐलान किया कि रिलायंस ‘जियो गीगा-फाइबर’ सेवा 5 सितंबर, 2019 से शुरू करेगा. इसका शुरुआती प्लान 700 रुपए का होगा जिसमें न्यूनतम 100 Mbps की स्पीड मिलेगी. आप सवाल करें कि हम रिलायंस का विज्ञापन चला रहे हैं, उससे पहले आपको बता दे कि ये खबर रिलायंस के प्लान के बारे में नहीं है. बल्कि उस तरीके के बारे में है, जिससे वो इतनी स्पीड देने वाला है. जियो इस स्पीड के लिए FTTH तकनीक का इस्तेमाल करने वाला है. ये क्या है, अब तक चल रहे ब्रॉडबैंड से कैसे अलग है और ज़्यादा स्पीड कैसे देगा, यही समझाने के लिए तो आपको यहां बुलाया है.

ये FTTH है क्या बला?

FTTH का फुल फॉर्म है ‘फाइबर टू दी होम’. हिंदी में बोले तो ‘घर तक फाइबर’. ये फाइबर है क्या और तेज़ कैसे है, उसके लिए आपको समझना होगा कि इंटरनेट आप तक पहुंचता कैसे है.

इंटरनेट का बेसिक काम वही है, जो डाकिए का होता है. इंटरनेट साधन है, एक जगह से दूसरी जगह इनफॅार्मेशन (जानकारी) पहुंचाने का. जैसे कि दी लल्लनटॉप के ऑफिस से आप तक इनफॅार्मेशन पहुंचाना. डाकघर हैं आपके कंप्यूटर और मोबाइल (अब तो हमारा ऐंड्रॉयड ऐप भी आ गया है). लेकिन यहां से आप इनफॅार्मेशन पहुंचती कैसे है? ये एक उदाहरण से समझिए. कि आपकी एक बुआ हैं, जिनके पास हर समस्या का समाधान होता है. आप उनसे पूछते हैं, वो तुरंत चिट्ठी लिखकर तरकीब सुझा देती हैं.

बुआ ने तरकीबों को पर्चों पर लिखकर एक भाड़े के घर में सजा लिया है. तो बुआ का घर हुआ सर्वर. वेबसाइट के लिंक के रूप में तरकीब बुआ के घर की खिड़कियों से झांकती रहती हैं. अब आपके फोन या कंप्यूटर की खिड़की बुआ के घर की खिड़कियों की तरफ खुलती हैं. खिड़कियों वाली बुआ की दीवार हमारे लिए हुए वेबपेज. आपको जब काम पड़ता है, अपनी खिड़की से हाथ बढ़ाकर बुआ की किसी खिड़की में सजे लिंक को क्लिक कर देते हैं.

# इंटरनेट ऐसी ही ढेर सारी बुआओं और उनके भाड़े के घरों का (माने सर्वरों का) नेटवर्क है. इंटरनेट का आइडिया अमेरिका में आया और वहीं की कंपनियां इसके खेल में बड़ी खिलाड़ी हैं, तो ज़्यादातर बुआओं के घर अमेरिका में हैं. कुछ के यूरोप में भी हैं. बाकी दुनिया में इनकी संख्या सीमित है.

फर्ज़ कीजिए आपने जिस तरकीब के लिंक पर क्लिक किया है, वो है अमेरिकन बुआ के घर में. तो जैसे बुआ तरकीब को लिखकर चिट्ठी तैयार करती है, वैसे ही इंटरनेट कंपनिया सर्वर से जानकारी का एक पैकेट तैयार कर लेती हैं. ये पैकेट एक तरह का सिग्नल होता है. रोशनी का सिग्नल. और रोशनी का सिग्नल एक जगह से दूसरी जगह तक भेजने के लिए चाहिए कांच. लेकिन अमेरिका से भारत तक कांच बिछाने में तो बहुत खर्च होगा. और दिखेगा तब भी धुंधला. यहीं से एंट्री हुई फाइबर की. ऑप्टिकल फाइबर की. इसमें प्रकाश बढ़िया क्वालिटी में एक छोर से दूसरे तक पहुंचता है. तो इन्हीं ऑप्टिकल फाइबर के ज़रिए जानकारी का पैकेट सबसे पहले अमेरिका के किसी ऐसे शहर लाया जाएगा, जहां समंदर हो.

# वहां से प्रकाश का वो सिग्नल माने अपना पैकेट ऑप्टिकल फाइबर के मोटे-मोटे गुच्छों में दाखिल होगा. फिर समंदर के नीचे बिछे फाइबर के मोटे-मोटे केबल से होते हुए मुंबई जैसे किसी समुद्रतटीय शहर में पहुंचेगा.

# इसके बाद सिग्नल से बुआ की चिट्ठी को डिकोड कर लिया जाएगा. ये डीकोडेड चिट्ठी भारत में उस कंपनी के पास पहुंचेगी, जिससे आपने इंटरनेट लिया है. टेक्निकल शब्दावली में ये कंपनी आपकी ISP यानी ‘इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर’ है.

# अब आपकी ISP कंपनी चिट्ठी की तरकीब को, माने इनफॅार्मेशन को आपकी लोकेशन के नज़दीक किसी बड़े शहर पहुंचने को कहेगी. इनफॅार्मेशन आपकी तलाश में भटकते-भटकते उस शहर पहुंच जाएगी. और आप तक पहुंचेगी. मोबाइल इंटरनेट के केस में सबसे नज़दीक नेटवर्क टावर से उड़ कर. और फिक्स्ड लाइन ब्रॉडबैंड के केस में जमीन के नीचे बिछे केबल से.

इनफॅार्मेशन के रास्ते

आप तक बुआ की चिट्ठी कितनी जल्दी पहुंच सकती है, ये इस बात पर निर्भर करता है कि डाकिए का रास्ता कैसा है. मुरम का है, गिट्टी का, डामर का या सीमेंट का. फिर वो रास्ता सिंगल लेन है, डबल लेन या फोर लेन. इंटरनेट पर मौजूद जानकारी के लिए भी इसी तरह के रास्ते होते हैं. सबसे पहले जानिए इंटरनेट की कच्ची सड़क के बारे में.

कॉपर की कच्ची सड़क

# टीवी केबल वाला रास्ता

# फ़ोन लाइन वाला रास्ता

ऊपर बताई सड़कें मिट्टी-पत्थर वाली हैं. कच्ची. वो यूं कि शुरू के दोनों तरीकों से इनफॅार्मेशन कॉपर वायर के ज़रिए आती है. इनसे दूर तक इनफॅार्मेशन पहुंचाना चुनौती भरा काम है. और साथ ही स्लो भी है.

फाइबर वाला हाईवे

# फाइबर में इनफॅार्मेशन बिजली की जगह प्रकाश के सिग्नल का अवतार ले लेती है. लाइट सिग्नल यानी रोशनी. प्रकाश. जीके का फैक्ट है कि समूचे ब्रह्मांड में लाइट की स्पीड सबसे ज्यादा है. कितनी है?

299792457 मीटर प्रति सेकंड या 1080000000 km/h. 

पॉइंट टू बी नोटेड – इनफॅार्मेशन लाइट सिग्नल तो है लेकिन फाइबर में ये लाइट की स्पीड से सफ़र नहीं करती. और इसका कारण ये है कि फाइबर में इनफॅार्मेशन सीधी रेखा में नहीं बल्कि ज़िग-ज़ैग यानी लहराकर चलती है. इससे इसकी स्पीड लाइट की स्पीड की एक-तिहाई हो जाती है. लेकिन ये भी बहुत-बहुत ज्यादा है.

अगर इलेक्ट्रिकल सिगनल ठेला है, तो लाइट सिगनल बुलेट ट्रेन है. जापान वाली.

# ऑप्टिकल-फाइबर केबल में बहुतै पतली फाइबर की नालियां होती हैं. आपके बालों से भी कई गुना पतली. इन फाइबर की नालियों की डिजाईन इस प्रकार की जाती है कि लाइट इनसे बाहर न जा सके.

बड़ा सीधा सा सिद्धांत है, डाकिए को जितनी दूर तक हाइवे मिलेगा, उतनी ही तेज़ बुआ की चिट्ठी आएगी. सूचना को भी जितनी दूर तक ऑप्टिकल फाइबर में चलने को मिलेगा, उतनी वो तेज़ आप तक पहुंचेगी. लेकिन अब तक सूचना के साथ धोखा होता था. वो मुंबई या किसी बड़े शहर तक तो फाइबर में आती थी, लेकिन शहर पहुंचकर आपके घर तक पहुंचने के लिए उसको बोला जाता था कि अब तुम कॉपर-वायर वाले रस्ते से निकलो. तो इनफॅार्मेशन दोबारा अवतार बदलकर बिजली के सिगनल में ढलती थी. ये बात पूरी स्पीड खा जाती थी.

ये उसी तरह का सीन है कि चमचमाते हाइवे पर 1000 किलोमीटर पर चलने के बाद आपको 100 किलोमीटर पैदल चलने को कहा जाए. समझ गए न क्या झोल है?

FTTH तकनीक में फाइबर होम तक आता है. माने बुआ के घर से सीधे आपके घर तक चौड़ा सा हाइवे होता है. जानकारी को बिजली में ढलने का झंझट पालना ही नहीं पड़ता. यही राज है FTTH की तेज़ी और तंदरुस्ती का.

महाभारत काल में

इतिहास के सबसे होनहार विद्यार्थी और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री विपलव देव कहते हैं इंटरनेट का इतिहास महाभारत काल जितना पुराना है. हम उससे एक स्टेप और आगे की बात कहते हैं. इंटरनेट की ही तरह FTTH का इतिहास भी महाभारत काल जितना ही पुराना है. संजय नामक फाइबर धृतराष्ट्र और कुरुक्षेत्र के बीच बिछा हुआ था. चिपक कर इनफार्मेशन दे रहा था. यही तो FTTH है गुरू.

फिर से….

लगभग एक साल पहले, 15 अगस्त, 2018 को रिलायंस ने ‘जियो गीगा-फाइबर’ का बीटा-वर्ज़न लॉन्च किया था. बीटा-वर्ज़न मतलब मुंह-दिखाई. इतने दिन टेस्टिंग चली. कि चलाके देख लो कैसा है. फिर जो भी कमियां नज़र आएंगी, उनको दुरूस्त कर के बढ़िया से लॉन्च किया जाएगा टाइप. अब उस बढ़िया वाले लॉन्च का समय आ गया है. मोबाइल इंटनेट की दुनिया में जैसा प्राइस वॉर शुरु हुआ था, वैसा ही फिक्स्ड लाइन के मामले में भी हो सकता है. जियो के पास सस्ती और बढ़िया सेवाएं देने के लिए असीम संसाधन हैं. और मार्केट कैप्चर करने के लिए असीमित भूख.

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