November 14, 2018

14 नवंबर को क्यों मनाया जाता है बाल दिवस, 20 नवंबर को क्यों नहीं?

देश के इतिहास में 14 नवंबर की तारीख स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन के तौर पर दर्ज है. उनके निधन के बाद इस दिन को बाल दिवस के तौर पर मनाया जाने लगा.

14 नवंबर 1889 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (तबके इलाहाबाद) में जन्मे जवाहरलाल नेहरू को बच्चों से खासा लगाव था और बच्चे उन्हें ‘चाचा नेहरू’ कहकर पुकारते थे. नेहरू बच्चों को देश का भविष्य बताते थे. वो कहते थे कि ये जरूरी है कि बच्चों को प्यार दिया जाए, उनकी देखभाल की जाए ताकि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें जवाहर लाल नेहरू को बच्चों से बहुत प्यार था। वह बच्चों के कल्याण को लेकर काफी सजग रहा करते थे। वह स्कूली बच्चों को भोजन और अन्य जरूरी चीजें मुहैया कराने के लिए कार्यक्रम लॉन्च करते रहते थे। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान बच्चों के कल्याण के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए। इन कार्यक्रमों से बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित हुई और उनकी जरूरतों को पूरा किया जा सका। वे कहा करते थे कि बच्चे देश का भविष्य हैं। उन्होंने बच्चों की शिक्षा के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए। लोगों को शिक्षा के महत्व से अवगत कराने के लिए भी कई कार्यक्रम उनके कार्यकाल में शुरू किए गए। इन सभी से अप्रत्यक्ष तौर पर बच्चों को लाभ हुआ। नेहरूजी बच्चों के साथ-साथ युवाओं का विकास चाहते थे इसलिए उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) और आईआईएम (IIM) जैसी संस्थाओं की स्थापना की।

भारत में 1964 से पहले तक बाल दिवस 20 नवंबर को मनाया जाता था, लेकिन जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद उनके जन्मदिन यानी 14 नवंबर को बाल दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया गया. 27 मई 1964 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद सर्वसहमति से ये फैसला लिया गया कि जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन को बाल दिवस के तौर पर माना जाए. इस तरह से भारत को दुनिया से अलग अपना एक बाल दिवस मिला. इससे पहले 1954 में संयुक्त राष्ट्र ने 20 नवंबर को बाल दिवस के तौर पर मनाने का ऐलान किया था. यही वजह है कि आज भी कई देशों में 20 नवंबर को ही बाल दिवस मनया जाता है, जबकि कई देश ऐसे हैं जो 1 जून को बाल दिवस मनाते हैं.

बाल दिवस के दिन बच्चों को गिफ्ट्स दिए जाते हैं और स्कूलों में तरह-तरह के कार्यक्रम आयोजिक कराए जाते हैं.

पंड‍ित नेहरू के अनमोल वचन:

जाहिर है, दक्षता का सबसे अच्छा प्रकार वह है, जो मौजूदा सामाग्री का अधिकतम लाभ उठा सके।।

बिना शांति के सभी सपने खो जाते हैं और राख में मिल जाते हैं।।

हम एक अद्भुत दुनिया में रहते हैं जो सौंदर्य, आकर्षण और रोमांच से भरी हुई है।

यदि हम खुली आंखों से खोजे तो यहां रोमांच का कोई अंत नहीं है।।

संकट और गतिरोध जब होते हैं तो वो हमें कम से कम एक फायदा देते हैं, वो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं।।

असफलता तभी आती है जब हम अपने आदर्श उद्देश्य और सिद्धांत भूल जाते हैं।।

जो व्यक्ति भाग जाता है वो शांत बैठे व्यक्ति की तुलना में अधिक खतरे में पड़ जाता है।।

जो पुस्तकें हमें सोचने के लिए विवश करती हैं, वो ही हमारी सबसे ज्यादा सहायक होती हैं।।

आप तस्वीर के चेहरे दीवार की तरफ मोड़ के इतिहास का रुख नहीं बदल सकते हैं।

दूसरों के अनुभवों से लाभ उठाने वाला बुद्धिमान होता है।

बहुत अधिक सतर्क रहने की नीति सभी खतरों में सबसे बड़ी है।

आईये पंड‍ित जवाहरलाल नेहरू से जुड़े कुछ प्रेरक प्रसंग बताते हैं….

नेहरू की आत्मनिर्भरता 

नेहरूजी इंग्लैंड के हैरो स्कूल में पढ़ाई करते थे। एक दिन सुबह अपने जूतों पर पॉलिश कर रहे थे तब अचानक उनके पिता पं. मोतीलाल नेहरू वहां जा पहुंचे।
जवाहरलाल को जूतों पर पॉलिश करते देख उन्हें अच्छा नहीं लगा, उन्होंने तत्काल नेहरूजी से कहा- क्या यह काम तुम नौकरों से नहीं करा सकते। जवाहरलाल ने उत्तर दिया- जो काम मैं खुद कर सकता हूं, उसे नौकरों से क्यों कराऊं?
नेहरूजी का मानना था कि इन छोटे-छोटे कामों से ही व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है।
शिष्टाचार पर नसीहत
बात उन दिनों की है जब पंडित जवाहरलाल नेहरू लखनऊ की सेंट्रल जेल में थे। लखनऊ सेंट्रल जेल में खाना तैयार होते ही मेज पर रख दिया जाता था। सभी सम्मिलित रूप से खाते थे।
एक बार एक डायनिंग टेबल पर एक साथ सात आदमी खाने बैठे। तीन आदमी नेहरूजी की तरफ और चार आदमी दूसरी तरफ।
एक पंक्ति में नेहरूजी थे और दूसरी में चंद्रसिंह गढ़वाली। खाना खाते समय शकर की जरूरत पड़ी। बर्तन कुछ दूर था चीनी का, चंद्रसिंह ने सोचा- ‘आलस्य करना ठीक नहीं है, अपना ही हाथ जरा आगे बढ़ा दिया जाए।’ चंद्रसिंह ने हाथ बढ़ाकर बर्तन उठाना चाहा कि नेहरूजी ने अपने हाथ से रोक दिया और कहा- ‘बोलो, जवाहरलाल शुगर पाट (बर्तन) दो।’
वे मारे गुस्से के तमतमा उठे। फिर तुरंत ठंडे भी हो गए और समझाने लगे- ‘हर काम के साथ शिष्टाचार आवश्यक है।
भोजन की मेज का भी अपना एक सभ्य तरीका है, एक शिष्टाचार है। यदि कोई चीज सामने से दूर हो तो पास वाले को कहना चाहिए- ‘कृपया इसे देने का कष्ट करें।’ शिष्टाचार के मामले में नेहरूजी ने कई लोगों को नसीहत प्रदान की थी। ऐसे थे जवाहरलाल नेहरू।
नेहरू की विनोदप्रियता 
एक बार एक बच्चे ने ऑटोग्राफ पुस्तिका नेहरूजी के सामने रखते हुए कहा- साइन कर दीजिए।
बच्चे ने ऑटोग्राफ देखे, देखकर नेहरूजी से कहा- आपने तारीख तो लिखी ही नहीं!
बच्चे की इस बात पर नेहरूजी ने उर्दू अंकों में तारीख डाल दी! बच्चे ने इसे देख कहा- यह तो उर्दू में है।
नेहरूजी ने कहा- भाई तुमने साइन अंगरेजी शब्द कहा- मैंने अंगरेजी में साइन कर दी, फिर तुमने तारीख उर्दू शब्द का प्रयोग किया, मैंने तारीख उर्दू में लिख दी।
ऐसा था नेहरूजी का बच्चों के प्रति विनोदप्रियता का लहजा।
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